शुक्रवार, २४ जुलै, २०२६

मेरे बच्चों...

 

(एआय संपादित प्रतिमा)

दोस्तों...
कुछ दिनों से हैरान, परेशान हूॅं| मेरी तरह आप में से भी कईं निश्चितही अस्वस्थ होंगे| इसी मनोवस्था में कुछ पंक्तियां दिल से निकली हैं, वहीं नीचे दी हैं| ये कविता उन सभी बच्चों के नाम समर्पित है, जो अपने भविष्य पर विश्वास करना चाहते हैं...और उन सभी माता-पिताओं के नाम, जो अपनी खामोशी का बोझ ढो रहे हैं...|


मेरे बच्चों...
आज एक सच तुम्हें बता ही दूॅं...
कि तुम्हारा ये बाप नपुंसक है...
ये सच है की मैंने तुम्हें जनम दिया,
लेकिन फिर भी, 
...मैं नपुंसक हूॅं |

शायद तुम्हें पहले ही पता हो...
या शायद अब जान गए हों...
फर्क नहीं पडता उससे कुछ
जो सच्चाई है, नहीं बदलेगी वो...

मेरे बच्चों...
कुछ सोचकर
कुछ अच्छा ही सोचकर
मैंने तुम्हें जनम दिया...
सुनहरा भविष्य सामने रखकर
आनंद भरा वर्तमान देना चाहा..

मगर...
न वर्तमान को मुस्कुराना सिखा पाया,
न भविष्य के माथे पर
कोई उजली सुबह लिख पाया।

दिख रही है तो सिर्फ कालिख
वर्तमान और भविष्य में भी...
चारों ओर सिर्फ धुऑं
और गोलियों की बौछारें..
रक्त में लथपथ
आपका वर्तमान और भविष्य भी...

अपने ही लोग सामने खडें, 
रास्ता रोकें...
मंझिल ढुंढने निकले 
युवाओं को टोकें...
हवा में बारूद संग,
डर ज्यादा घोलते हुए|

मैं दूर खड़ा
बस खबरें गिनता रहा...
हर चीख को
अपने भीतर दबाता रहा...

हर बार सोचा,
अब बोलूँगा...
अब अन्याय के सामने
सीना तानकर खड़ा हो जाऊँगा...

लेकिन...
हर बार
मेरे होंठों पर
रोटी की चिंता रख दी गई,
जिम्मेदारियों की हथकड़ियाँ पहना दी गईं,
और मैं
अपने ही डर का बंदी बन गया...

मेरे बच्चों,
इसीलिए कहता हूँ-
तुम्हारा ये बाप नपुंसक है।

न इसलिए कि
उसमें रक्त नहीं,
न इसलिए कि
उसमें साहस कभी था ही नहीं...
बल्कि इसलिए कि
जब सच को मेरी आवाज़ चाहिए थी,
मैं खामोश रहा...

जब आप बच्चें
अपने अधिकारों के लिए 
सड़कों पर खड़े हैं,
मैं घर में बैठकर
आपकी सलामती की 
दुआएँ भर करता रहा हूॅं...

इतिहास शायद
मेरी मजबूरियाँ नहीं पूछेगा...
वो सिर्फ इतना लिखेगा-
कि एक पूरी पीढ़ी
अन्याय देखती रही,
और चुप रही...

अगर कभी
तुम मुझसे सवाल करो—
"पिताजी, आपने ऐसा क्यूँ किया?"
तो शायद
मेरी झुकी हुई नज़रें ही
मेरा उत्तर होंगी...

बस...
मेरा आपसे इतना ही कहना
अन्याय के सामने जब रहो खड़े,
तो मेरी इस विरासत को मत अपनाना...
मेरी खामोशी को मत दोहराना...

ताकि तुम्हें तुम्हारे बच्चों को
कभी यह न कहना पड़े—

"मेरे बच्चों...
तुम्हारा ये बाप नपुंसक है..."


©आलोक 'प्रियदर्शन'

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